सुप्रीम कोर्ट ने जोजरी-बांडी-लूणी नदी तंत्र में अवैध बजरी खनन पर SIT गठन के दिए निर्देश

राजस्थान अवैध बजरी खनन SIT खबर के लिए नदी में रेत और भारी मशीनरी की प्रतीकात्मक तस्वीर
प्रतीकात्मक तस्वीर, राजस्थान की नदियों का वास्तविक दृश्य नहीं | Photo: Boris Hamer / Pexels (Free Stock Photo)

राजस्थान अवैध बजरी खनन SIT जांच को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने राज्य सरकार को तीन दिनों के भीतर विशेष जांच दल गठित करने का निर्देश दिया है। यह जांच जोजरी, बांडी और लूणी नदियों तथा उनकी सहायक धाराओं में कथित संगठित अवैध बजरी खनन, उसके परिवहन और बिक्री के नेटवर्क की पड़ताल करेगी। 6 नवंबर 2026 को प्रकाशित LiveLaw की रिपोर्ट के अनुसार, 26 अक्टूबर के आदेश में अदालत ने सरकारी अधिकारियों की संभावित मिलीभगत, लापरवाही या उल्लंघनों की जानकारी होने के बावजूद कार्रवाई न करने की भूमिका की जांच भी शामिल की है।

तीन सदस्यीय नहीं, वरिष्ठ पुलिस नेतृत्व वाली SIT

सुप्रीम कोर्ट ने SIT का नेतृत्व ऐसे अधिकारी को सौंपने का निर्देश दिया है जो पुलिस महानिरीक्षक (IG) के पद से नीचे न हो। टीम में जोधपुर, बालोतरा और पाली के पुलिस अधीक्षकों को भी शामिल किया जाना है। अदालत ने कहा कि जांच केवल मौके पर पकड़े गए वाहनों या दर्ज मामलों तक सीमित न रहे, बल्कि यह पता लगाया जाए कि अवैध खनन में कौन व्यक्ति या संस्था शामिल है, खनिज निकालने, ढोने और बेचने का नेटवर्क कैसे काम करता है और इससे किसे लाभ मिलता है।

जांच में यह भी देखा जाएगा कि क्या किसी सार्वजनिक अधिकारी ने अवैध गतिविधियों को बढ़ावा दिया, सहयोग किया, कर्तव्य में लापरवाही बरती या उल्लंघन की जानकारी होने के बाद भी कार्रवाई नहीं की। अदालत ने निर्देश दिया है कि जिम्मेदार पाए जाने वालों के खिलाफ उचित कार्रवाई की जाए। SIT को अगली सुनवाई 27 नवंबर 2026 तक स्थिति रिपोर्ट दाखिल करनी होगी।

नदी किनारे सुरक्षा क्षेत्र और उद्योगों पर रोक

अदालत ने नदियों की दर्ज बाहरी सीमाओं के दोनों ओर अतिरिक्त 100 मीटर का सुरक्षात्मक क्षेत्र बनाए रखने का निर्देश दिया है। साथ ही, इन सीमाओं से 500 मीटर के भीतर Red Category उद्योग स्थापित करने की अनुमति नहीं होगी। सुप्रीम कोर्ट ने राज्य को नदी तंत्र के आसपास नए औद्योगिक प्रतिष्ठानों की अनुमति देने से भी रोका है, जब तक नदियों की हाई फ्लड लाइन (HFL) और बफर क्षेत्र का वैज्ञानिक निर्धारण नहीं हो जाता।

HFL नदी में बाढ़ के दौरान पानी के उच्चतम स्तर से संबंधित सीमा है। नदी किनारे किसी निर्माण या औद्योगिक गतिविधि का पर्यावरणीय मूल्यांकन करते समय इस सीमा और आसपास के क्षेत्र का महत्व होता है। वैज्ञानिक निर्धारण से यह समझने में मदद मिलती है कि बाढ़ का पानी किस क्षेत्र तक पहुंच सकता है और नदी के प्राकृतिक प्रवाह पर किन गतिविधियों का असर पड़ सकता है।

बाद में मिली खनन लीज से पुराने उल्लंघन समाप्त नहीं

LiveLaw की रिपोर्ट के मुताबिक, अदालत ने राज्य के खनन विभाग की उस दलील पर चिंता जताई जिसमें कहा गया था कि कुछ क्षेत्रों में पहले अवैध खनन पाए जाने के बाद निर्धारित प्रक्रिया के तहत लीज जारी की गई। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि बाद में लीज मिल जाना अपने आप यह साबित नहीं करता कि खनन पर्यावरणीय रूप से टिकाऊ है या नदी के प्राकृतिक प्रवाह, तल और किनारों की सुरक्षा के अनुरूप है।

अदालत ने स्पष्ट किया कि खनन पट्टा जारी करने की प्रशासनिक प्रक्रिया और वास्तविक खनन के दौरान पर्यावरणीय शर्तों का पालन—दो अलग-अलग प्रश्न हैं। नदी तल की मजबूती, किनारों की स्थिरता, रेत की प्राकृतिक पुनःपूर्ति, भूजल रिचार्ज और लगातार खनन के संयुक्त प्रभाव का स्वतंत्र मूल्यांकन जरूरी है।

करीब 20 लाख लोगों पर प्रभाव का उल्लेख

अदालत की कार्यवाही जोजरी-लूणी-बांडी नदी तंत्र में प्रदूषण से जुड़ी स्वतः संज्ञान कार्यवाही का हिस्सा है। रिपोर्ट में इस नदी तंत्र से प्रभावित पर्यावरण और लगभग 20 लाख लोगों की चिंता का उल्लेख किया गया है। नदी प्रदूषण और अवैध खनन का असर केवल जल प्रवाह तक सीमित नहीं रहता। इससे भूजल, कृषि, पशुपालन, स्थानीय आजीविका और नदी पर निर्भर पारिस्थितिकी प्रभावित हो सकती है।

कोर्ट ने एकीकृत सार्वजनिक रिपोर्टिंग और पर्यावरण शिकायत निवारण व्यवस्था में गुमनाम शिकायत दर्ज कराने की सुविधा जोड़ने का निर्देश भी दिया है। इस व्यवस्था का उद्देश्य लोगों को अवैध बजरी खनन और नदी तंत्र को नुकसान पहुंचाने वाली गतिविधियों की सूचना देने का सुरक्षित माध्यम उपलब्ध कराना है। शिकायतों को दर्ज करने, जांचने और सक्षम प्राधिकरण तक भेजने की प्रक्रिया बनाई जानी है।

बालोतरा और भूजल पर अलग रिपोर्ट

अदालत ने जोधपुर, बालोतरा और पाली में भूजल उपलब्धता, दोहन और गिरावट की स्थिति पर केंद्रीय भूजल प्राधिकरण से भी रिपोर्ट मांगी है। LiveLaw की रिपोर्ट में बालोतरा क्षेत्र में भूजल के अत्यधिक दोहन और औद्योगिक प्रदूषण को लेकर उठाई गई चिंताओं का उल्लेख है। अदालत ने केंद्रीय भूजल प्राधिकरण को कार्यवाही में पक्षकार बनाने और संबंधित जिलों की स्थिति पर हलफनामा दाखिल करने को कहा है।

अब जांच और अनुपालन पर नजर

इस आदेश के बाद सबसे महत्वपूर्ण सवाल यह होगा कि SIT निर्धारित समय में गठित होती है या नहीं, जांच में किन नेटवर्क और अधिकारियों की भूमिका सामने आती है और नदी किनारे सुरक्षा क्षेत्र लागू करने के लिए प्रशासन क्या कदम उठाता है। अदालत की अगली सुनवाई 27 नवंबर 2026 को निर्धारित है। तब तक SIT की स्थिति रिपोर्ट और राज्य सरकार की अनुपालन कार्रवाई पर नजर रहेगी।

स्रोत: LiveLaw, 6 नवंबर 2026।


DLP News TV24 पर धौलपुर, आगरा, मुरैना, राजस्थान, उत्तर प्रदेश और देश-दुनिया की विश्वसनीय खबरों के लिए जुड़े रहें। वेबसाइट: dlpnewstv.com | YouTube | Facebook | X

ताजा खबरों और अपडेट के लिए हमारा WhatsApp News Group जॉइन करें।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *