राजस्थान हाईकोर्ट ST आरक्षण से जुड़े एक मामले में अदालत ने स्पष्ट किया है कि किसी व्यक्ति को एक राज्य में अनुसूचित जनजाति (ST) के रूप में मान्यता मिलने से दूसरे राज्य की भर्ती में उसी आरक्षण का लाभ अपने आप नहीं मिल जाता। टाइम्स ऑफ इंडिया की 7 नवंबर 2026 की रिपोर्ट के अनुसार, राजस्थान हाईकोर्ट की खंडपीठ ने गुजरात की एक महिला की विशेष अपील खारिज कर दी। महिला ने राजस्थान में नर्सिंग ऑफिसर पद की भर्ती में ST श्रेणी के तहत विचार किए जाने की मांग की थी।
मामला किस भर्ती से जुड़ा था?
रिपोर्ट के मुताबिक, अपीलकर्ता बारिया शर्मिष्ठा बेन गुजरात की ऐसी जाति से संबंधित थीं जिसे वहां ST श्रेणी में मान्यता प्राप्त है। विवाह के बाद वह राजस्थान आ गईं और उन्होंने नर्सिंग ऑफिसर पद के लिए आवेदन किया। उनका तर्क था कि उनकी जाति गुजरात और राजस्थान दोनों राज्यों में ST के रूप में पहचानी जाती है, इसलिए उन्हें राजस्थान की भर्ती में भी उसी श्रेणी का लाभ मिलना चाहिए।
राज्य अधिकारियों ने उनकी उम्मीदवारी को आरक्षित ST श्रेणी के बजाय सामान्य श्रेणी में माना। इसके खिलाफ उन्होंने पहले एकल पीठ के समक्ष याचिका दायर की थी, जिसे 23 सितंबर को खारिज कर दिया गया। इसके बाद उन्होंने विशेष अपील दाखिल की। 5 नवंबर 2026 को न्यायमूर्ति विनीत कुमार माथुर और न्यायमूर्ति चंद्रशेखर शर्मा की खंडपीठ ने अपील पर फैसला सुनाया।
अदालत ने क्या कहा?
टाइम्स ऑफ इंडिया की रिपोर्ट के अनुसार, खंडपीठ ने सुप्रीम कोर्ट के पूर्व निर्णयों का हवाला देते हुए कहा कि आरक्षण का आधार संबंधित राज्य में समुदाय की सामाजिक परिस्थितियों और वहां मौजूद विशिष्ट वंचनाओं से जुड़ा होता है। एक ही नाम वाली जाति या जनजाति की स्थिति अलग-अलग राज्यों में अलग हो सकती है। इसलिए किसी राज्य में प्राप्त अनुसूचित जनजाति का दर्जा दूसरे राज्य में स्वतः समान लाभ का अधिकार नहीं देता।
अदालत ने यह भी माना कि राजस्थान की भर्ती के विज्ञापन में जिस श्रेणी के तहत विचार का प्रावधान था, उसके अनुसार दूसरे राज्य की ST मान्यता के आधार पर राजस्थान में आरक्षण का दावा स्वतः स्वीकार नहीं किया जा सकता। खंडपीठ ने एकल पीठ के फैसले को बरकरार रखा और अपील में हस्तक्षेप करने का आधार नहीं पाया।
राज्य-विशिष्ट आरक्षण का सिद्धांत
भारत में अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति की सूचियां संवैधानिक प्रावधानों के तहत राज्य और केंद्र शासित प्रदेश के संदर्भ में अधिसूचित होती हैं। किसी समुदाय की सामाजिक, ऐतिहासिक और भौगोलिक परिस्थितियां अलग राज्यों में भिन्न हो सकती हैं। इसी कारण एक राज्य की सूची में शामिल होने का अर्थ यह नहीं है कि वही समुदाय दूसरे राज्य की सूची में भी समान स्थिति में होगा या वहां की भर्ती में स्वतः आरक्षण का लाभ पाएगा।
इस सिद्धांत का उद्देश्य आरक्षण को उस राज्य की विशिष्ट सामाजिक परिस्थितियों के अनुरूप लागू करना है जिसके लिए सूची अधिसूचित की गई है। हालांकि, किसी व्यक्ति की पात्रता का अंतिम निर्धारण संबंधित संवैधानिक सूची, भर्ती विज्ञापन, प्रमाणपत्र और लागू न्यायिक आदेशों के आधार पर होता है। केवल जाति के नाम में समानता को पर्याप्त आधार नहीं माना जा सकता।
उम्मीदवारों के लिए क्या मायने?
राजस्थान में सरकारी नौकरी के लिए आवेदन करने वाले उम्मीदवारों को भर्ती विज्ञापन में दिए गए आरक्षण संबंधी नियम ध्यान से पढ़ने चाहिए। यदि कोई उम्मीदवार दूसरे राज्य से आया है या विवाह, निवास परिवर्तन अथवा अन्य कारण से राज्य बदला है तो उसे अपने आरक्षण प्रमाणपत्र की राज्य-विशिष्ट वैधता की जांच करनी चाहिए। भर्ती प्राधिकरण द्वारा मांगे गए दस्तावेज और पात्रता की शर्तें पूरी करना जरूरी है।
उम्मीदवारों को आवेदन से पहले संबंधित विभाग या भर्ती बोर्ड से लिखित स्पष्टीकरण लेना चाहिए, खासकर तब जब प्रमाणपत्र किसी अन्य राज्य से जारी हुआ हो। गलत श्रेणी चुनने से आवेदन की जांच, दस्तावेज सत्यापन और नियुक्ति प्रक्रिया में परेशानी हो सकती है। किसी कानूनी विवाद की स्थिति में विशेषज्ञ सलाह लेना उचित है।
फैसले की सीमा समझना जरूरी
यह फैसला एक विशेष नर्सिंग ऑफिसर भर्ती और अपीलकर्ता के दावे से जुड़ा है। इसे हर राज्य, हर समुदाय और हर भर्ती पर बिना संदर्भ लागू मानना सही नहीं होगा। अदालत ने संबंधित मामले में राज्य-विशिष्ट आरक्षण सिद्धांत और भर्ती के नियमों के आधार पर निर्णय दिया। किसी अन्य मामले में तथ्य, अधिसूचना या लागू नियम अलग हो सकते हैं।
स्रोत: द टाइम्स ऑफ इंडिया, 7 नवंबर 2026।
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