
1 बड़ी प्रशासनिक विफलता: धौलपुर में ब्लैकआउट मॉक ड्रिल साबित हुई खौफनाक मजाक, सरकारी इमारतों पर जलती रहीं लाइटें, जनता रही भीषण कन्फ्यूजन में
dlpnewstv.com विशेष ग्राउंड रिपोर्ट: आपातकालीन स्थितियों, युद्ध या हवाई हमलों (Air Raids) के समय किसी भी शहर की सुरक्षा तैयारियों को परखने के लिए नागरिक सुरक्षा (Civil Defense) और प्रशासन द्वारा समय-समय पर ‘ब्लैकआउट मॉक ड्रिल’ (Blackout Mock Drill) का आयोजन किया जाता है। लेकिन राजस्थान के धौलपुर जिले में शुक्रवार रात को आयोजित की गई ब्लैकआउट मॉक ड्रिल पूरी तरह से एक खौफनाक प्रशासनिक विफलता साबित हुई।
इस अत्यंत संवेदनशील और अहम अभ्यास का उद्देश्य यह जाँचना था कि आपातकाल के समय शहर को कितनी जल्दी और प्रभावी ढंग से अंधेरे में डुबोया जा सकता है, ताकि दुश्मन के विमानों को शहर की लोकेशन (Location) का पता न चल सके। लेकिन प्रचार-प्रसार की भीषण कमी और विभागों के बीच आपसी तालमेल (Coordination) के अभाव के कारण यह ड्रिल महज एक खानापूर्ति और हास्यास्पद मजाक बनकर रह गई।
हालात इतने दर्दनाक और शर्मनाक थे कि आम जनता तो दूर, खुद सरकारी महकमों ने ही इस ब्लैकआउट ड्रिल के दिशा-निर्देशों की सरेआम धज्जियां उड़ा दीं। जहां पूरे शहर में 15 मिनट का घुप्प अंधेरा होना चाहिए था, वहीं कई सरकारी इमारतें और कार्यालय दूधिया रोशनी में जगमगा रहे थे।
- धौलपुर में शुक्रवार रात 8:00 बजे से 8:15 बजे तक निर्धारित थी ब्लैकआउट मॉक ड्रिल।
- 15 मिनट के बजाय केवल शुरुआती 3 मिनट तक ही कटी बिजली, जिसके बाद वापस आ गई सप्लाई।
- प्रशासन की खौफनाक लापरवाही: आम जनता को नहीं दी गई थी मॉक ड्रिल की कोई पूर्व सूचना।
- नियमों की उड़ी धज्जियां: ब्लैकआउट के दौरान भी कई सरकारी इमारतों पर जलती रहीं तेज लाइटें।
- रात 8:15 बजे (ड्रिल खत्म होने के समय) अचानक फिर कटी बिजली, जिससे जनता में फैला भीषण भ्रम।
- नागरिकों का दावा: उचित प्रचार-प्रसार होता तो मिलता जनता का शानदार और 100% सहयोग।
15 मिनट का था प्लान, 3 मिनट में ही निकल गई हवा
जिला प्रशासन और नागरिक सुरक्षा (Civil Defense) विभाग द्वारा जारी किए गए आधिकारिक शेड्यूल (Schedule) के अनुसार, शुक्रवार रात ठीक 8:00 बजे से लेकर 8:15 बजे तक पूरे धौलपुर शहर और आस-पास के कस्बों में पूर्ण ब्लैकआउट (Total Blackout) किया जाना था। इस दौरान शहर की स्ट्रीट लाइट्स (Street Lights), घरों की बत्तियां, व्यावसायिक प्रतिष्ठानों के साइन बोर्ड और वाहनों की हेडलाइट्स तक को बंद रखने के निर्देश होते हैं।
निर्धारित समय यानी रात के 8 बजते ही धौलपुर में बिजली विभाग (Discom) ने पावर कट (Power Cut) कर दिया। पूरे शहर में एकदम से अंधेरा छा गया। लेकिन यह अंधेरा और मॉक ड्रिल का अनुशासन मात्र 3 मिनट तक ही टिक पाया।
रात 8 बजकर 3 मिनट पर अचानक से शहर की बिजली आपूर्ति (Power Supply) वापस बहाल कर दी गई। बिजली आते ही घरों में टीवी चलने लगे, बाजारों में रौनक वापस आ गई और सड़कों पर फिर से रोशनी जगमगा उठी। मात्र तीन मिनट में ही प्रशासन के इस अहम और बड़े अभियान की पूरी तरह से हवा निकल गई।
लोगों को लगा कि शायद यह कोई सामान्य बिजली कटौती (Trimming/Fault) थी जो अब ठीक हो गई है। बिजली विभाग और प्रशासन के बीच तालमेल की इस खौफनाक कमी ने पूरी मॉक ड्रिल के उद्देश्य को ही मिट्टी में मिला दिया।
जनता को नहीं थी भनक: प्रचार-प्रसार की भीषण कमी
किसी भी मॉक ड्रिल (चाहे वह भूकंप की हो, आग लगने की हो या ब्लैकआउट की) की सफलता पूरी तरह से आम जनता की सक्रिय और शानदार भागीदारी पर निर्भर करती है। लेकिन धौलपुर प्रशासन ने इस बुनियादी नियम को ही दरकिनार कर दिया।
शहर के अधिकांश निवासियों ने मीडिया से बातचीत करते हुए बताया कि उन्हें इस ब्लैकआउट ड्रिल के बारे में कोई पूर्व सूचना (Prior Information) नहीं दी गई थी। सूचना विभाग (Information and Public Relations Department) और स्थानीय प्रशासन ने न तो अखबारों में कोई बड़ा विज्ञापन दिया, न ही सोशल मीडिया पर कोई अलर्ट जारी किया और न ही शहर में लाउडस्पीकर (Public Address System) के माध्यम से कोई मुनादी कराई।
नतीजतन, जब रात 8 बजे बिजली कटी, तो लोगों ने इसे हर रोज होने वाली सामान्य कटौती समझा। कई लोग अपने इन्वर्टर (Inverter) और जनरेटर (Generator) चालू करके अपने घरों और दुकानों को रोशन किए बैठे रहे। जिन लोगों को सड़क पर गाड़ी रोककर अपनी हेडलाइट्स बंद करनी चाहिए थीं, वे सामान्य रूप से तेज रफ्तार में गाड़ियां दौड़ाते रहे।
नागरिकों का स्पष्ट कहना था कि यदि प्रशासन ने समय रहते उन्हें जागरूक किया होता, तो वे देशहित के इस अहम कार्य में अपना 100% और सुखद सहयोग प्रदान करते। बिना जनता को बताए मॉक ड्रिल करना किसी खौफनाक मजाक से कम नहीं है।
रक्षक ही भक्षक: सरकारी इमारतों पर जलती रहीं रोशनियां
इस ब्लैकआउट ड्रिल का सबसे दर्दनाक और निराशाजनक पहलू यह रहा कि जिन सरकारी विभागों के कंधों पर इस नियम का पालन कराने की जिम्मेदारी थी, उन्होंने ही सबसे पहले इसकी धज्जियां उड़ाईं।
आम जनता से तो यह उम्मीद की जाती है कि वे अपने घरों की एक मोमबत्ती भी न जलाएं, लेकिन इसके ठीक विपरीत, धौलपुर शहर की कई प्रमुख सरकारी इमारतों, कार्यालयों और चौराहों पर लगी हाई मास्ट लाइट्स (High Mast Lights) इस ड्रिल के दौरान पूरी तरह से जलती हुई दिखाई दीं।
यह एक बड़ी प्रशासनिक लापरवाही को दर्शाता है। यदि यह सचमुच में कोई युद्ध का समय होता और दुश्मन के विमान आसमान में मंडरा रहे होते, तो सरकारी इमारतों की ये जगमगाती लाइटें पूरे शहर को भीषण तबाही का शिकार बना सकती थीं।
प्रशासनिक अधिकारियों को सबसे पहले अपने कर्मचारियों और कार्यालय प्रभारियों को यह कठोर निर्देश देना चाहिए था कि ड्रिल के समय इन्वर्टर और जनरेटर भी बंद रखे जाएं। लेकिन ऐसा प्रतीत होता है कि इस ड्रिल को केवल एक ‘कागजी फॉर्मेलिटी’ (Paper Formality) मानकर निपटा दिया गया।
8:15 बजे का दूसरा कट: जनता में पैदा हुआ खौफनाक भ्रम
जैसे-तैसे 15 मिनट का समय पूरा हुआ। नियम के अनुसार, रात 8:15 बजे ड्रिल समाप्त हो जानी चाहिए थी और शहर में सुचारू रूप से बिजली व्यवस्था लागू रहनी चाहिए थी। लेकिन यहाँ भी प्रशासन का भीषण कन्फ्यूजन सामने आया।
ठीक 8:15 बजे, जब ड्रिल का समय समाप्त हो रहा था, बिजली विभाग ने अचानक फिर से पूरे शहर की बिजली काट दी। इस दूसरी कटौती ने लोगों के दिमाग में एक खौफनाक भ्रम और गुस्सा पैदा कर दिया। लोग समझ ही नहीं पा रहे थे कि आखिर चल क्या रहा है।
कुछ लोगों को लगा कि शायद अब असली ब्लैकआउट शुरू हुआ है, जबकि कुछ लोग इसे बिजली विभाग की अघोषित कटौती (Unscheduled Power Cut) मानकर कोसने लगे। 8 बजे से 8:15 तक के बीच बिजली का आना, फिर जाना, और ड्रिल के खत्म होने के समय दोबारा चले जाना—यह सब एक बड़े सिस्टम फेल्योर (System Failure) का जीता-जागता प्रमाण था।
यह स्पष्ट हो गया कि बिजली ग्रिड को संचालित करने वाले कर्मचारियों और नागरिक सुरक्षा विभाग के अधिकारियों के बीच न तो कोई टाइमिंग (Timing) सेट थी और न ही संवाद (Communication) का कोई उचित माध्यम था।
मॉक ड्रिल का असली महत्व और भविष्य के लिए सुखद सुझाव
स्थानीय प्रबुद्ध नागरिकों और सेवानिवृत्त सैन्य अधिकारियों के अनुसार, ऐसी मॉक ड्रिल का उद्देश्य केवल बिजली काटना नहीं होता है। इसका वास्तविक और शानदार उद्देश्य आपातकालीन स्थितियों के लिए शहर की तैयारियों (Preparedness) का आकलन करना होता है।
इसके तहत पुलिस, दमकल विभाग (Fire Brigade), अस्पताल और नागरिक सुरक्षा स्वयंसेवकों का रिस्पांस टाइम (Response Time) चेक किया जाता है। यह देखा जाता है कि अंधेरे में क्या कोई लूटपाट या चोरी की खौफनाक घटना तो नहीं घट रही है। क्या ट्रैफिक पुलिस अंधेरे में यातायात को सुचारू रूप से संचालित कर पा रही है?
लेकिन धौलपुर में इनमें से किसी भी मापदंड का पालन नहीं किया गया। यह ड्रिल केवल एक मजाक बनकर रह गई। भविष्य में ऐसे किसी भी अभ्यास को आयोजित करने से पहले प्रशासन को निम्नलिखित अहम कदम उठाने चाहिए:
- ड्रिल से कम से कम 3 दिन पहले अखबारों, टीवी चैनलों और सोशल मीडिया पर व्यापक प्रचार-प्रसार किया जाए।
- सरकारी कार्यालयों को सख्त और कठोर निर्देश दिए जाएं कि वे अपने जेनरेटर और इन्वर्टर बंद रखें।
- आम जनता को बताया जाए कि ब्लैकआउट के दौरान उन्हें क्या करना है और क्या नहीं करना है (Do’s and Don’ts)।
- बिजली विभाग और नागरिक सुरक्षा अधिकारियों के बीच वॉकी-टॉकी (Wireless Sets) के माध्यम से शानदार समन्वय स्थापित किया जाए।
निष्कर्ष: प्रशासन को लेनी होगी गंभीर सीख
धौलपुर में हुई इस ब्लैकआउट मॉक ड्रिल की विफलता प्रशासन के लिए एक बहुत बड़ी चेतावनी है। जो प्रशासन एक साधारण सी 15 मिनट की ड्रिल को ठीक से प्रबंधित नहीं कर सका, वह वास्तविक आपातकाल या युद्ध जैसी भीषण और खौफनाक स्थिति में लाखों नागरिकों की सुरक्षा कैसे सुनिश्चित करेगा?
जिला कलेक्टर और नागरिक सुरक्षा नियंत्रक को इस विफलता की उच्च स्तरीय जांच करवानी चाहिए और उन अधिकारियों की जवाबदेही तय करनी चाहिए जिनकी लापरवाही के कारण यह अहम आयोजन मजाक बना।
dlpnewstv.com उम्मीद करता है कि प्रशासन इस घटना से सबक लेगा और भविष्य में जब भी ऐसी कोई ड्रिल होगी, वह एक शानदार और सफल उदाहरण पेश करेगी, जिसमें जनता और प्रशासन कंधे से कंधा मिलाकर चलेंगे।
धौलपुर जिले की प्रशासनिक व्यवस्थाओं, खामियों और हर बड़ी ख़बर के लिए dlpnewstv.com पर रोज़ाना विज़िट करें।





